(Hindi)विवाह सम्बन्धों में मधुरता और समस्याओं के ज्योतिषीय आधार

Astrology for marriage and relationships 
 
ज्योतिष में विवाह के सुख को सातवें  और दूसरे घर से मुख्य रूप से देखा जाता है l इसके साथ चतुर्थ भाव से घर की सुख- शांति और समस्याओं को भी देखा जाता है l विवाह के कारक ग्रह शुक्र के साथ गुरु का भी विशेष महत्व है l शुक्र को ज्योतिष शस्त्र में भोग, कला और सौंदर्य का कारक ग्रह माना जाता है l वहीं गुरु  विवेक , सम्पन्नता और  संतान का कारक ग्रह है l 
 
शुक्र यदि कुंडली में शुभ ग्रहों से दृष्ट हो या उससे केंद्र-त्रिकोण   में शुभ ग्रह हों तो जातक को विवाह का अच्छा सुख प्राप्त होता है l किन्तु शुक्र पर यदि पाप ग्रहों जैसे शनि , मंगल, राहु या केतु इत्यादि का  प्रभाव  हो तो दांपत्य सुख का आभाव रहता है, जिसका कारण विवाह-इतर (extra-marital) सम्बन्ध भी हो सकते हैं l 
 
कुंडली में गुरु का प्रभाव यदि पंचम , सप्तम और चतुर्थ भाव या इन भावों के स्वामियों पर हो तो जातक को संतान, जीवन -साथी और मकान का सुख मिलाता है l किन्तु यदि विवाह से सम्बंधित उपरोक्त योगों में अच्छे और बुरे दोनों योग कुंडली में बने हुए हैं, पर साथ ही सप्तम भाव पर गुरु की दृष्टि पड़ रही है तब तनाव के होने पर भी विवाह में सम्बन्ध विछेद (divorce)  नहीं होता l 
 
कई बार विवाह सम्बन्ध अच्छे होते हुए भी दांपत्य जीवन में कुछ समय के लिए तनाव उत्पन्न हो जाते हैं l इस समस्या का कारण कुंडली में अशुभ भावों की दशा या क्रूर ग्रहों का गोचर में प्रभाव हो सकता है l विवाह सम्बन्धी इन समस्याओं को नवांश कुंडली के गहन अध्धयन से जान कर उनके समाप्त होने के संभावित समय के बारे में एक अच्छा   ज्योतिषी पहले से  सकता है l विवाह सम्बन्धों में तनाव या मधुरता की संभावना जानने हेतु ज्योतिष में नवांश कुंडली का विशेष महत्व होता है l 
 
कई बार विवाह के आरम्भ से ही पति-पत्नी में तनाव उत्त्पन हो जाता है l इस समस्या का कारण किसी अशुभ दशा का विवाह के समय कुंडली में होना भी हो सकता है l विवाह से पूर्व लिया गया  गई उचित ज्योतिषीय परामर्श इस सम्बन्ध में लाभदायक हो सकता है l यदि आने वाली दशाएं शुभ भावों से सम्बंधित हैं तो विवाहिक जीवन में आ रही अड़चने समाप्त हो सकती हैं l 
विवाह सम्बन्धों में मधुरता के लिए आवश्यक है के पति-पत्नी दोनों एक दूसरे को सम्मान दें और आपसी व्यवहार में सामजस्य बनाए रखें l 

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